कालिंज़र क़िला एवं नीलकंठ महादेव मंदिर (बुंदेलखंड)

 

 

 

 

 

 

प्रिंस कुमार , प्रबंधक, परीक्षा विभाग, BIMTECH

विश्व के प्राचीनतम किलो में शुमार विंध्य की पहाड़ी पर 700 फीट ऊंचाई पर स्थित यह किला अनेक युद्धों का प्रत्यक्ष गवाह है। आरंभ में यह स्थान तीर्थ रूप में था किंतु दुर्ग के लिए भी उपयुक्त था। इस किले की वास्तविकता आज भी रहस्य बनी हुई है, कुछ इतिहासकारो का कहना है कि इसका निर्माण बर्गुजर राजाओ नें 150 से 250 ई. के मध्य करवाया था। दुर्ग में प्रवेश के लिए सात दरवाजे हैंI यहाँ कई तरह की गुफ़ाएँ हैं, जिनका ओर तो है लेकिन छोर नहींI जिनका इस्तेमाल सीमाओं की हिफाजत के लिए होता थाI किले में मौजूद रानी महल में, एक दौर था जब महफिलें सजा करती थींI कहते हैं कि आज 1500 साल बाद भी शाम ढलते ही एक नर्तकी के कदम यहां थिरकने लगते हैं, फर्क यह है कि अब इन घुंघरुओं की आवाज दिल बहलाती नहीं बल्कि दिल दहला जाती है! 

रणनीतिक दृष्‍टि से देखा जाय तो इस दुर्ग की पृष्ठभूमि ढेरों युद्धों एवं आक्रमणों से भरी पड़ी है। विभिन्न राजवंशों के हिन्दू तथा मुस्लिम शासकों द्वारा इस पर बड़े आक्रमण हुए, किन्तु चन्देलों के अलावा कोई भी लम्बा नहीं टिका। इसकी सुरक्षा प्राचीर की परिधि लगभग 6 किमी है।ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्‍टि से देखा जाय तो यहाँ गुप्त काल से लेकर मध्य काल के अभिलेख है, हजारों नष्ट-भ्रष्ट एवं ग्रेनाइट तथा बलुआ पत्थर की खण्डित मूर्तियां हैंI किले के अंदर धार्मिक मूर्तियों का दुर्लभ भंडार है जो झाँसी से लेकर खजुराहो तक के म्यूज़ियमों की शोभा बढ़ा रहा हैI प्राचीन स्मारक सुरक्षा कानून 1905 में बना था, तभी से पूरा दुर्ग और मूर्तियां सुरक्षित घोषित कर दी गई थीं। 100 सालों से अधिक समय से शिल्प-संग्रह का यह भंडार बुन्देल शासक छत्रसाल के वंशज अमान सिंह द्वारा बनवाये अमान सिंह महल में सुरक्षित है। दुर्ग एवं इसके नीचे तलहटी में बसा कस्बा, दोनों ही इतिहासकारों की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि यहाँ मन्दिरों के अवशेष, मूर्तियां, शिलालेख एवं गुफ़ाएं, आदि सभी उनके रुचि के साधन हैं। कालिंज़र दुर्ग में कोटि तीर्थ के निकट लगभग २० हजार वर्ष पुरानी शंख लिपि स्थित है जिसमें वनवास के समय भगवान राम के कालिंज़र आगमन का भी उल्लेख किया गया है। इसके अनुसार श्रीराम, सीता कुंड के पास सीता सेज में ठहरे थे। किले में कई आकर्षण है जिनमें अलग अलग कई महल, मंदिर, तालाब और वन हैंI तालाबों के जल को औषधीय गुणों से भरपूर माना जाता हैI मान्यता है कि चंदेल राजा कीर्तिवर्मन का कुष्ठ रोग भी यहीं स्नान करने से दूर हुआ था। 

नीलकंठ मंदिर व किले तक जाने वाले मार्ग पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की टिकट चौकियां हैं। पहले प्रवेश निःशुल्क था, किन्तु 2015 से प्रवेश शुल्क है। इसका उद्देश्य दुर्ग के अनुरक्षण हेतु निधि जुटाने के साथ साथ आवारा जानवरों एवं असामाजिक तत्वों पर रोक लगाना भी है।

हजारों साल पुराने इस किले का इतिहास ही कुछ ऐसा है कि लोग इन वीरान खंड्हरों की ओर खिंचे चले आते हैंI किले के इतिहास से अलग लोगों को ज्यादा दिलचस्पी है छुपे खजाने मेंI किले ने अब तक जितनी भी लड़ाइयां झेली वो सब खजाने को लेकर ही हुईंI माना जाता है कि कालिंज़र किले में प्राचीन काल से ही हीरे-जवाहरातों का जखीरा हैI यहाँ के स्तंभों एवं दीवारों में कई प्रतिलिपियां हैं जिसमें यहाँ छुपे हुए खजाने की जगह का रहस्य भी छुपा हैI दरअसल ये दुर्ग पहाड़ी नहीं अपितु एक लम्बी चौड़ी पहाड़ी को चारों तरफ से घेर कर, उंची और मोटी दीवारों से सुसज्जित कर पूरी पहाड़ी को ही एक दुर्ग का रूप दे दिया गया हैI

महात्मा बुद्ध के समय यहाँ चेदि वंश का आधिपत्य रहा, बुद्ध की यात्रा वर्णन में उनके कालिंज़र आने का उल्लेख है। इसके बाद यह मौर्य साम्राज्य के अधीन आ गया, तत्पश्चात् शुंग वंश तथा कुछ वर्ष पाण्डुवंशियों का आधिपत्य रहा। इनके बाद यह वर्धन साम्राज्य के अधीन भी रहा। गुर्जर प्रतिहारों के शासन में यह उनके अधिकार में आया एवं नागभट्ट द्वितीय के समय तक रहा। 249 ई. में यहाँ हैहय वंशी कृष्णराज का शासन था, एवं चतुर्थ शताब्दी में नागों का अधिकार हुआ, जिन्होंने यहाँ नीलकंठ महादेव का मन्दिर बनवाया। तत्पश्चात् सत्ता गुप्त वंश को हस्तांतरित हुई।

महात्मा बुद्ध के समय यहाँ चेदि वंश का आधिपत्य रहा, बुद्ध की यात्रा वर्णन में उनके कालिंज़र आने का उल्लेख है। इसके बाद यह मौर्य साम्राज्य के अधीन आ गया, तत्पश्चात् शुंग वंश तथा कुछ वर्ष पाण्डुवंशियों का आधिपत्य रहा। इनके बाद यह वर्धन साम्राज्य के अधीन भी रहा। गुर्जर प्रतिहारों के शासन में यह उनके अधिकार में आया एवं नागभट्ट द्वितीय के समय तक रहा। 249 ई. में यहाँ हैहय वंशी कृष्णराज का शासन था, एवं चतुर्थ शताब्दी में नागों का अधिकार हुआ, जिन्होंने यहाँ नीलकंठ महादेव का मन्दिर बनवाया। तत्पश्चात् सत्ता गुप्त वंश को हस्तांतरित हुई।

शेरशाह शूरी ने नवम्बर, 1544 में कालिंज़र  पर आक्रमण कर दिया, दुर्ग पर घेरा एक साल तक रहा, दोनो तरफ से भयानक युद्ध हुआ किन्तु दुर्ग पर शेरशाह का अधिकार नहीं हो पायाI अंत में मामला हाथ से निकलते देख शेरशाह ने दुर्ग को बारूद से उड़ाने का निश्चय किया। 22 मई, 1545 को क़िले पर तोपों से गोले दागने शुरु किये गये, इसी दौरान शेरशाह के बारूदखाने में भयानक आग लग गयी जिससे शेरशाह बुरी तरह जल गयाI फिर भी दुर्ग पर क़ब्ज़े की लालसा से उसने दुर्ग पर आक्रमण जारी रखने की आज्ञा दीI आखिरकार, ये युद्ध और क़िला तो जीत लिया गया लेकिन शेरशाह मौत से युद्ध हार गया तथा क़िले पर शासन् करने का उसका सपना, सपना ही रह गया! तदुपरांत इस क़िले पर राजपूतों ने अपना प्रभुत्व क़ायम कर लिया।

1569 ई. अकबर ने मजनू ख़ाँ को क़िले पर आक्रमण के लिए भेजा, परंतु राजा रामचन्द्र ने बिना विरोध के क़िला मुग़लों को सौंप दिया। इसके बाद कालिंज़र किला राजा छत्रसाल के अधीन हो गया और फिर इस पर पन्ना के राजा हरदेव शाह ने शासन किया तथा मान्धाता चौबे को कालिंज़र का दुर्गपति नियुक्त किया।

1812 में ब्रिटिश सेना ने बुंदेलखंड पर आक्रमण किया, कर्नल मार्टिन्डेल ने चौबे परिवार को दुर्ग से बेदखल कर अपने अधिकार में ले लिया। इसके बाद अंग्रेज़ों ने कालिंज़र को बाँदा जनपद में सम्मिलित कर दुर्ग को सैनिक छावनी में बदल दिया। 

कालिंज़र अर्थात समय का विनाशक – काल: अर्थात समय, एवं जर: अर्थात विनाश। मान्यताओं के अनुसार सागर मन्थन उपरान्त भगवान शिव ने विष का पान कर अपने कण्ठ में ही रोक लिया जिससे उनका कण्ठ नीला हो गया तब वे कालिंज़र आये व काल पर विजय प्राप्त की। तभी से कालिंज़र स्थित शिव मन्दिर को नीलकंठ कहते हैं। कालिंज़र किला भगवान शिव का निवास माना जाता है। इसमें नीलकंठ महादेव का अनोखा मंदिर हैं। जिसका निर्माण नागों (नागवंशियों) ने कराया था, मंदिर का जिक्र पुराणों में है। मंदिर में नीले रंग का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है। यहाँ पर्वत काटकर बनाई गई कालभैरव की विशाल प्रतिमा है जिसके बगल में चट्टान काटकर जलाशय बनाया गया है जो पहाड़ से ढका है। वक्ष में नरमुंड और त्रिनेत्र धारण किए यह प्रतिमा बेहद जीवंत है। काल भैरव को भगवान शिव का रौद्र रूप माना जाता है। यह एक झूलता हुआ मंदिर प्रतीत होता है, जब आप यहाँ पर खड़े होते हैं तो लगता है मानो आप सैकड़ों फीट उंची किसी इमारत की सैकड़ों फीट बालकनी के बाहर झांक रहे हैंI मंदिर के 170 सीढ़ी उपर क़िले की मबज़ूत दीवार और नीचे जंगलI चन्देलों के समय से ही यहां पूजा अर्चना ब्राहम्ण नही बल्कि राजपूत करते हैंI ऐसा शायद यहाँ होते रहे युद्धों को देख कर किया होगा! प्रवेशद्वार के दोनों ही ओर ढेरों देवी-देवताओं की मूर्तियां दीवारों पर तराशी गयी हैं। महाकाव्यों, पुराणों और अन्य प्राचीन संस्कृत ग्रन्थों में कालिंज़र को शैव साधना का एक महत्तवपूर्ण केन्द्र स्वीकारा गया है।

कालिंज़र दुर्ग अभी भी पर्यटन नक़्शे पर उस प्राथमिकता में शामिल नहीं है, जैसा कि उसे होना चाहिए। इसका मुख्य कारण कालिंज़र और उसके आसपास के क्षेत्र में पर्यटन सम्बंधी सुविधाओं का अभाव होना है। अखिल भारतीय बुंदेलखंड विकास मंच के प्रयासों से इसे यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित कराने हेतु अथक प्रयास किये गए हैं, जिनमें अब पुरातत्त्व विभाग भी जुड़ गया है। एक बार युनेस्को की इस सूची में कालिंज़र के जुड़ जाने पर यह स्थल विश्व के पर्यटन मानचित्र में जुड़ जाएगा।  

प्रिंस कुमार
प्रबंधक
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BIMTECH

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